एक अति प्राचीन मंदिर जो अब खंडहर में बदल गया (बालानाथ समाधि स्थल या शिव मंदिर)

भारत का इतिहास इतना ऐतिहासिक है की जिसका कल्पना करना नामुमकिन है। जगह जगह ऐसे स्मारक, इमारत, मंदिर, मठ,किला,महल आदि आप पाएंगे जिसे देख आप ताजुब खायेंगे की आखिर इसका निर्माण कैसा हुआ होगा, नक्कासी देख आप दंग रह जायेंगे की आखिर महिम नक्काशी करना वो भी आज से हजारों वर्ष पूर्व संभव कैसे हुआ होगा । कदम कदम पर आपको भारतीय इतिहास के साक्ष्य मिल जायेंगे किंतु विडंबना की बात यह है की ऐसी ऐतिहासिक स्थल आजकल खंडहरों, जंगलों और जमींदोश हो रहे है। लोगो की उपेक्षा का शिकार होकर अपने अस्तित्व को रही ऐसे स्थल भारत की बरबादी की कहानी लिख रही है। आज एक ऐसे ही मंदिर एवम् समाधि स्थल के विषय में बताऊंगा ,जिसकी कहानी सुन आप रो देंगे।

बालानाथ समाधि स्थल या शिव मंदिर–
नीचे तस्वीर में आप मंदिर जो देख पा रहे है ,उसे देख आप इस मंदिर की पौरानिकता का अंदाजा लगा ही लिए होंगे। किंतु दुख की बात तो यह है की इतनी पुरानी संरचना होने के बावजूद भी यहां के लोग इस स्थान के वास्तविक नाम नहीं जानते है। अजीब लगा होगा , हमे भी लगा था ।

मंदिर पटना से 15 किलोमीटर की दूरी पर गंगा–गंडक के संगम पर बसा सोनपुर में स्थित है। हरिहरनाथ मंदिर के पीछे वाले रास्ते से 500 मीटर की दूरी पर यह स्थान है।

मंदिर की तरफ जाने वाले रास्ते की ओर जैसे ही बडेंगे वैसे ही आप दाहिने तरह एक छोटा सा स्तंभ या स्मारक आपको मिलेगा। सुंदर नक्काशी और एक ही पत्थर से बना स्मारक का ऊपरी भाग कलाकृति का अनूठा नमूना आप देख पाएंगे । उसी स्मारक में नीचे आपको एक खाली स्थान मिलेगा जिसमे संभवत मूर्ति रही होगी जिसका निशान आज भी देखा जा सकता है किंतु आज उसमे कोई भी मूर्ति नही हैं।

5 मीटर की दूरी पर आपको मुख्य मंदिर मिल जायेगा। आपको बता दूं इसमें कई मंदिरों का संग्रह था किंतु आज वर्तमान में सिर्फ 2 मंदिर और एक समाधी स्थल बचा हुआ है और इनका भी हालात खंडहर और जंगलों में तब्दील हो रहा है। कुछ स्थान पर मूर्तियां और शिवलिंग देखे जायेंगे किन्तु उसके ऊपर आपको छत नहीं दिखेगा और ना ही कोई मंदिर, किंतु मंदिरनुमा संरचना आप आसानी से देख पाएंगे और यह सब देख आप यह आसानी से कह सकते है की यहां के मंदिरों को तोड़ा गया होगा । यहां तक कि यहां एक पुजारी या साधु रहा करते थे, और इस दैविक स्थल की पूजा और रखवाली किया करते थे,किंतु उडंगकारी लोगो ने उन्हें वहा से जाने पर मजबूर कर दिया। अब इस स्थान का जिम्मेदारी  अरुण सिंह के हाथ में जिसे पूर्व के पुजारी उन्हें सौंप चले गए। अरुण जी की बात माने तो यही के कुछ शरारती तत्व के लोग इस मंदिर को ध्वस्त करना चाहते है उनका कहना है की कईयों की बुरी नज़र मंदिर के जमीन पर है और पीछे और दाहिने तरफ से कई लोगो ने मंदिर का जमीन हड़प लिए है।  नेता मंत्री को भी सूचित करने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं होने पर अरुण जी टूट चुके है। अरुण जी अपने दोनो बेटियो के साथ इस ऐतिहासिक दैविक स्थल की रखवाली और सेवा में लगे हुए है,किंतु मरणोपरांत इसे लोग तोड़कर हड़प लोगे इस दर्द को अरुण जी लिए घुट घुट के जी रहे है।

मंदिर का इतिहास–
इस मंदिर का इतिहास कितना पुराना है या क्या है इसका कोई भी लिखित बेवरा मौजूद नहीं है,किंतु लोकमानयता के आधार पर यह मंदिर 400–500 वर्ष पुराना है किंतु जितना हमने शोध किया या इतिहास की जानकारी उसे यह दावा किया जा सकता है की मंदिर उसे भी पुराना हो सकता है। पहली मंदिर कि उचाई लगभग 10 फिट है और इसके ऊपरी गुंबद देख ऐसा प्रतीत होता है,की यह बेहद पुराना है । इस छोटे से मंदिर का द्वार बेहद छोटा है, एक खिड़की के आकार का, इसमें प्रवेश करने के लिए आपको झुककर जाना होगा अंदर आपको अंदर छोटी शिवलिंग दिखेगा किंतु यह वास्तविक शिवलिंग नहीं है ,लोगो का कहना है शिवलिंग की चोरी हो गई है। मंदिर का निर्माण में इस्तेमाल किया गया इट को देख आपको प्रतीत होगा की वह खजुरिया ईट है। बेहद पतली और लंबी चौड़ी ईट देख यही प्रतीत होता है की यह खजुरिया ही है किंतु यह ठीक ठीक वैसा ही प्रतीत नहीं होता क्युकी इट की मोटाई बहुत कम है। फिर भी इस प्रकार के इट का निर्माण आज से हजार वर्ष पूर्व होता था।  5 कदमों की दूरी पर दूसरा मंदिर मिल जायेगा, इस मंदिर को देख आपको यह प्रतीत होगा की यही मुख्य मंदिर रहा होगा क्युकी मंदिर सबसे बड़ा है और इसका प्रवेश द्वार भी पिछली मंदिर से बड़ा है। मंदिर के ऊपरी गुंबद चौड़े पिरामित की तरह बनाया गया है और चारो तरह अलग अलग प्रकार की प्रतिमा बनाई गई है। यह मंदिर काफी जर्जर अवस्था में पहुंच गया है। अंदर में आपको एक शिवलिंग मंदिर के बीचों बीच स्थित है और पीछे की तरफ एक शिलापथ है जिस पर कुछ तस्वीर फ्रेम की तरह नजर जायेगा किंतु उस में आपको कोई भी प्रतिमा नही दिखेगी किंतु कुछ संरचना दिख जायेगा। अंदर से ऊपर गुंबद की ओर आप देखेंगे तो आपको सुंदर और पुराने चित्रकारी देखो को मिलेगा । इस चित्र में आप नाग, कुछ जानवर, कुछ देवी देवता की प्रतिमा देखी जा सकती है किंतु धीरे धीरे यह मिट रही है।

बगल में आप नए ढंग से बना एक मंदिर देख पाएंगे जिसमे यह के एक साधु जिनका नाम बालनाथ बताया जाता है उनका समाधि स्थल है। दरवाजे पर कुछ मंत्र और बालनाथ समाधि स्थल लिखा मिल जायेगा । वही तिथि भी लिखी है किंतु तिथि के पीछे के अंक छोड़कर आगे का अंक मिट चुका है।  यहां हमे इत्र तित्र। नाग के कैचूर मिले और लोगो से पूछने पर पता चल की यह भूमि नागभूमि है।

मंदिर को बचाने की जरूरत–
इस प्रकार के पुराने मंदिर बहुत ही कम देखने को मिलते है। इन्हे संजोने की अवश्यता है, इसे यहां के लोगो को चाहिए की इस मंदिर का उत्थान करे। जनप्रतिनिधि और सरकार को भी इस धरोहर का दर्जा देकर इसे संरक्षित करना चाहिए ।हो रहे मंदिर के जमीन का अधिग्रहण को भूमाभिया से मुक्त करवाना होगा। प्रचार प्रसार कर इस स्थान के महत्व को लोगो तक पहुंचाना चाहिए।

जितना हो सके हमने कोशिश किया इस चीज को लोगों तक पहुंचाने की और आगे भी हमारी कोशिश रहेगी किंतु जब तक स्थानीय लोगों का भरपूर सहयोग और सरकार की तरफ से वाजिद कोशिश ना होगी तब तक ऐसे ऐतिहासिक दैविक स्थल का विकास होना संभव नहीं दिखता है।

उम्मीद करता हूं आज का आर्टिकल आपको पसंद आया होगा और इस आर्टिकल को आप दूर तक शेयर करें ताकि लोग जान सके भारत का इतिहास कितना पुराना है और कैसे खंडहरों में तब्दील होते जा रहा है और साथ ही साथ जब इस खंडहर नुमा मंदिर में आप जाइएगा तो खंडहर चीख चीख कर आप से पूछेगी कि आखिर मेरा उद्धार कब होगा।
शाब्दिक त्रुटि को नजरअंदाज करें धन्यवाद

लेखन – गौतम राज़

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