सती प्रथा –एक झूठी कुप्रथा

भारत का इतिहास बहुत ही प्राचीन और गौरवमई है यहां की संस्कृति ने पूरे विश्व को इंसानियत की सही मिसाल और जीवन जीने का सही मार्गदर्शन दिया है किंतु, समय के साथ-साथ भारतीय संस्कृति को कुप्रथा के रूप में प्रस्तुत कर भारतीय संस्कृति को बदनाम करने की कोशिश की गई और दुख की बात यह है कि भारतीय लोग ही इस कुप्रथा में शामिल थे । आज मैं एक ऐसे ही कुप्रथा के बारे में बात करूंगा जिससे हम सती प्रथा के नाम से जानते हैं इस प्रथा का नाम सुनते ही आपके मन में ख्याल आ गया होगा कि किसी का पति मर जाता है और पत्नी को उसी चिता पर जबरन या उसके मन मुताबिक उसके साथ ही जला दिया जाता है किंतु, वास्तविक सच्चाई कुछ और ही हैं जो कि भारतीय लोग नहीं जानते हैं और इसका न जाने के कारण ही है कि दुनिया यह मानती है कि भारतीय संस्कृति में भी कुप्रथा था का चलन था किंतु, आज मैं जो आपको बताऊंगा वह जानकर आप चौक जायेंगे और अपने भारतीय होने पर आपको गर्व होगा।

Amawa ke sati maiya

क्या है सती प्रथा–
भारतीय संस्कृति और इतिहास को अगर सबसे ज्यादा किसी ने नुकसान पहुंचाया है तो वह है अंग्रेजों ने। मुगलों के अपेक्षा अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति हमारी ऐतिहासिक विरासत को गलत तरीके से प्रस्तुत कर हमें अपने संस्कृति से भटका दिया चुकी अंग्रेजों को यह पता था कि अगर भारतीय अपनी संस्कृति का निर्वहन सही तरीके से करेंगे तो हम भारत पर ज्यादा लंबा समय तक राज नहीं कर पाएंगे और भारत से ज्यादा धनवान गुलाम देश अंग्रेजों को मिलने से रहा था ,इसीलिए उसने हमारी संस्कृति पर निशाना बनाया और हमें पूरी तरीके से बर्बाद कर दिया।
अंग्रेजों ने अनेक प्रथाओं को ,संस्कृति को गलत तरीके से हमारे सामने प्रस्तुत किया या उसे परिभाषित किया। उसी में से एक है सती प्रथा। अंग्रेजों ने हमारे संस्कृति को बदलते हुए सती प्रथा को इस प्रकार से परिभाषित किया कि उन्होंने कहा कि आदि काल से जब कोई व्यक्ति की मृत्यु हो जाती तब उसकी पत्नी को जबरन उसके चिता के साथ जला दिया जाता था चुकी भारतीयो को पहले गुलाम मुगलों ने बनाया। जिसके कारण शिक्षा का स्तर बहुत ही नीचे गिर गया था और फिर अंग्रेज जब आए तो भारतीयों को लगा कि अंग्रेज बहुत ही विद्वान है पढ़े लिखे हैं और जो यह कहते हैं वही सत्य होता है । इसी का फायदा उठाते हुए अंग्रेजों ने सती प्रथा का गलत मतलब हमारे मस्तिष्क में बिठा दिया। तब से कुछ लोग गलत तरीके से इस क्रू प्रथा को निभाते आ गए किंतु आज मैं इस आर्टिकल में आपको सती प्रथा की सत्यता को बताऊंगा।

सती प्रथा का सच –
असल में सही तरीके से जब अध्यन करेंगे या आप कुछ अंग्रेजी दार्शनिक का अध्ययन करेंगे तो आपको आपके भारतीय संस्कृति की सच्चाई पता चल जाएगा मैकोलो एक अंग्रेजी दार्शनिक था जो कि भारत पर काफी गहनता से उसने शोध किया और उसी ने ही इस चीज का खंडन किया क्योंकि अगर कोई भारतीय कहता है तो उसकी सत्यता पर सवाल उठाया जा सकता है लेकिन कोई अंग्रेज इस चीज का दावा करता है तो उसकी सत्यता को पूरी दुनिया के साथ-साथ भारतीय लोग भी मानेंगे तो उसने बताया की भारत में खास करके जो जनजातियां होती थी जो कि भारत में अभी 4528 के आसपास जनजातियां है। उसमें जैसे कि गोंड,भील  आदि जनजातियां में जब कोई पुरुष की मृत्यु होती थी तब जो दाह संस्कार की प्रक्रिया थी वह हिंदू संस्कृति के अनुसार होता था, ठीक उसी प्रकार से भी उनका होता था और एक समारोह की तरह उसे आयोजित किया जाता है और श्मशान घाट पर ले जाया जाता था या जहां भी दाह संस्कार होता था उस जगह पर उस लाश को ले जाया जाता था और उसके साथ उसकी पत्नी भी जाती है लाश को जैसे ही आग के हवाले किया जाता है तो महिला एक घड़ा लेकर उसमें पानी भरा होता है वह उस घड़े के साथ उसका के पाच चक्कर लगाती है और सर्वप्रथम अपने समाज के व्यवसाय समाज से पूछती है कि क्या यह वर्ग मेरा रक्षा पालन का जिम्मा लेता है क्या अगर हां कर दी तो फिर वह घड़ा को रखकर उनके शरण में रहती है उनकी छत्रछाया में रहती है अगर, उसे कोई स्वीकार नहीं करता है तो फिर वह चिता की पांच चक्कर लगाती है और फिर ज्योतिषी अध्यापक यानी कि समाज में 7 वर्ग होते हैं उनसे बारी बारी से पूछती हैं अगर किसी वर्ग ने उसके संरक्षण की जिम्मेदारी ले लेती है तो ठीक है अगर नहीं लेती है तो वह महिला वह गांव छोड़ कर चली जाती है अब वह महिला जब गांव छोड़कर जाती है तो उसका क्या होता है यह अपने आप में प्रश्न है ?    तो वह महिला गांव के आसपास या गांव के बाहर जो भी मंदिर हुआ करते थे उसमें अपना शरण ले लेती है और पूजा पाठ और  मंदिरों में आने वाले चढ़ावे से ही अपना जीवन निर्वहन करती है चुकी जीवन भर पूजा पाठ करने के कारण वह एक समाज या एक गांव की पूजनीय हो जाती थी अतः उसे अंततः गांव के सभी लोग सती का दर्जा देते थे और उसे पूजनीय मानते थे और यही असली कारण है या असली परिभाषा है सती का जिसे अंग्रेजी सभ्यताओं ने विखंडित कर गलत परिभाषा प्रस्तुत कर हमारे संस्कृति को बदनाम करने की नाकाम कोशिश की गई है।
तो अब कोई सती प्रथा के विषय में आपसे पूछे तो आप यह मत कहिए कि सती प्रथा वह प्रथा है जिसमें पति की मृत्यु के बाद पत्नी को उसके साथ जला दिया जाता था या अग्नि में प्रवाहित किया जाता है बल्कि सच्चाई यह है कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी समाज के साथ विभिन्न वर्गों से अपनी संरक्षण और जीवन यापन की सुरक्षा मांगती है अगर कोई समाज उसे स्वीकार ता है तो वह गांव में ही रहती है अगर नहीं कोई करता है तो वह गांव के एक ऐसे भाग को चयन करते जैसे मंदिर हुए मठ हुए वहां वह पूजा-पाठ और ईश्वरीय उनको प्राप्त हो जाती है । जिसके कारण एक समय के बाद वह पूरे समाज पूरे गांव के लिए पूजनीय हो जाती है तब जाकर लोग सही कहते हैं।
अब सोचने वाली बात है कि अगर सती का अर्थ यह है कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी को जला दिया जाता है तो वह सती कैसे हो सकती हैं वह तो जबरन एक तरह से हो गई और कोई भी अपनी बिना इच्छा के मृत्यु को ग्रहण नहीं कर सकती है। और किसी भी पुराण वेद शास्त्र में ऐसा उल्लेख नहीं है कि सती प्रथा में कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी को जला दिया गया । अगर मैं बात करूं त्रेता युग की तो राजा दशरथ जब राम के वियोग में मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं तब आप रामायण उठाकर देख लीजिए कहीं भी यह जिक्र नहीं मिलेगा कि दशरथ के साथ उसकी तीनों रानियों को उनके साथ ही चिता पर जला दिया गया या आप द्वापर युग की बात करूं मैं तो महाभारत में न जाने कितने शूरवीर वीरगति को प्राप्त हुए किंतु महाभारत में कहीं भी इस बात की फिक्र नहीं है कि जितने भी शूरवीर मरे उनकी अंतिम संस्कार के साथ-साथ उनको पत्नी को भी दाह संस्कार किया गया इसका अर्थ यह निकलता है कि सती प्रथा जैसी कोई कुप्रथा हमारे समाज में नहीं थी जो आधुनिक भारत में हमारी अज्ञानता का नाजायज फायदा उठाकर मुगल और अंग्रेजों ने हमारी संस्कृति को पूर्णता बदल दिया और हम पगलेट भारतीय उसी चीज को अपना लिए उसी चीज को सच मान लिया।
दरअसल सच्चाई यह है कि यूरोप के अधिकांश देशों में हजारों वर्षों से एक कठोर क्रू प्रथा चली आ रही है जिसे विच हंटिंग कहा जाता है यानी किसी महिला को आरोप बनाकर युवा डायन है फिर पूरे गांव मिलकर उसके साथ बदसलूकी करते थे और उसके बाद उसे जला दिया जाता था या विभिन्न यात्राओं के द्वारा उसे मारा जाता था। आप यूरोपीय देश मुगलों को ले लीजिए ईसाइयों को ले लीजिए यानी दूसरे शब्दों में कहूं कि आप सनातन धर्म को छोड़ किसी भी अन्य धर्म की बात करें उसमें महिलाओं को पांव की जूती या महज एक इस्तेमाल वाली वस्तु माना जाता है उसके साथ हमेशा ही दूर व्यवहार किया जाता रहा है किंतु सनातन धर्म में कहीं भी ऐसा जिक्र नहीं मिलता है कि महिलाओं पर उत्पीड़न किया जाता है महिलाओं को सूचित किया जाता है बल्कि सनातन धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म है जिसमें महिलाओं को देवी का दर्जा मिला है और महिला को आदिशक्ति भी कहा जाता है। तू अपनी संस्कृति को बचाने के लिए सही जानकारी का होना बहुत अनिवार्य है जो कि रॉयल यात्रा आपके सामने प्रस्तुत करते रहती है तो आप हमारे इस मुहिम में जुड़े रहिए हम भारत की असली इतिहास और संस्कृति को आपके समक्ष प्रस्तुत करता रहूंगा कुछ शाब्दिक त्रुटि हो सकती है जिसे नजरअंदाज करें।
धन्यवाद
लेखन–गौतम राज़

मेरा नाम पता है और मैं सोनपुर का रहने वाला हूं हमें लिखने हमें बहुत ही ज्यादा इंटरेस्ट है।

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