सावन में सोमवारी का महत्त्व (सोमवारी कथा)

हिंदू परंपरा में सावन महीने का अत्यधिक महत्व होता है उसी में सोमवारी (सोमवार) में किया गया पूजा अधिक लाभकारी और लोकप्रचलित है।

हर उमर के पुरुष , महिला इस महीने के हर सोमावरी के दिन शिव जी के विशेष पूजा अनुष्ठान करते है।  खासकर कुंवारी लड़कियां इस दिन शिव की आराधना करते है और उपवास भी रहती है । अनेकों शिवालयों में शिव के प्रतीक शिवलिंग पर जलाभिषेक करते है । इस प्रकार से देश दुनिया में जलाभिषेक को लेकर लोक आस्था यह कहती है की इस दिन शिव पर किया गाय जलाभिषेक से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।
आज हम इस आर्टिकल में जानेंगे , शिव का जलाभिषेक का महत्त्व सावन में कैसे अधिक है? सोमवारी व्रत करने से किस प्रकार का फल प्राति होता है? इसके पीछे की कथा या पौरानिक मान्यता क्या कहती है? सोमवारी व्रत करने की विधि?

सोमवारी व्रत करने की विधि–
अगर आप सोमवारी का व्रत करना चाहते है तो सर्व प्रथम आपको पूरा सावन शाकाहारी भोजन ग्रहण करना होगा, यहां तक कि सावन में लहसुन आदि का भी सेवन भी नही करना होता है।
सावन महीने की शुरुआत सावन के पूर्णिमा से शुरू हो जाता है। इस दिन नहा कर पूजा पाठ कर उस दिन से विधिवत तरीके से खुद को शिव के स्मरण में झोंक देना होता है।             

–सोमवारी के दिन  प्रातः स्नान कर पारंपरिक परिधान (कपड़े) का धारण कर महिला अपने परिधान धारण करे।
–पूजा सामग्री एकत्रित करे।
–बेल पत्तर, नारियल, पंचामृत, दूध , गंगा जल, कुमकुम ,धूप या अगरबत्ती, हुमाद , गाय का गोबर , कसैली, पान पत्ता, शिव महिमा पुस्तक आदि सामग्री जूटा ले।
–जिस स्थान पूजा करना है उस स्थान को गाय के गोबर से लिप ले।
–किसी मंदिर या खुद से शिव लिंग स्थापित करे और किसी पंडित से या खुद से पूजा शुरू करे ।
– शिव मात्रोच्यारण करे और शिव को मन में स्मरण करते रहे।
–सारे पूजा अनुष्ठान के उपरांत शिव की आरती करे और आरती मंत्र पढ़े और प्रसार सर्व प्रथम शिव को चढ़ाएं और फिर  घर के देवता और अंत में सभी में प्रसाद वितरण करे।
इस दौरान अगर आप किसी जरूरतमंद की मदद, किसी भूखे को खाना और किसी भी शत्रु की शत्रुता को भुलाकर उसे भी प्रसाद ग्रहण कर दे तो आपकी पूजा सफल हो जायेगी।

सोमवारी का महत्व और पौराणिक कथा–

सावन का जुड़ाव शिव से है और आज मैं आपको बताऊंगा आखिर साल के सावन महीने का इतना महत्त्व क्यों है और सावन में जलाभिषेक का कारण क्या है–
पौराणिक कथा की मानो तो माता पार्वती ने शिव को प्राप्त करने के लिए कई वर्षो तक साल के सावन महीने में सोमवारी को कठोर तप किया करती थी और शिव पर जलाभीषेक करती थी। सावन का महीने आप सबों को पता ही होता है की हल्की बारिश और प्रकृति से जुड़ा हुआ महीने होता है इस महीने को लोग आनंदित मानकर सारे काम धाम छोड़ इस मौसम का आनंद लिया करते है किंतु  पार्वती ने अपने आनंद का परित्याग कर शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तप कई वर्षो तक किया ,तब जाके हमारे भोले माता पार्वती को प्राप्त हुई ।
महत्व की बात करू तो इस महीने हर कुंवारी कन्या अपने मनवांछित वर के लिए भूखे रहकर , शिव की पूजा करती है और बदले में मनवांछित वर की कामना शिव जी के समक्ष प्रकट करती है।

सावन में कावड़ यात्रा–
बात त्रेता युग की है जब प्रभु श्री राम जी अवतरित थे । श्री राम बहुत बड़े शिव भक्त भी थे। एक बार उन्होंने शिव पर जलाभिषेक करने की ठानी किंतु आसपास कोई भी जल का श्रोत न होने के कारण दूर शुदुर गंगा जल लेकर शिवालय की ओर प्रदान कर दिए । इस दौरान रामचंद्र खाली पैर थे लंबी दूरी तय करने और कंकडमई रास्ते के करने राम जी का पैर लहूलुहान हो गया किंतु राम चंद्र मुस्कुराते हुए शिवालय पहुंचे और जलाभीषेक करते है, उपरांत शिव जी प्रकट होते है और राम जी को मनवांछित वर देते है । थे तो दोनो भगवान ही किंतु अवतार की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए यह पावन कार्य किया गया । तब से कावड़ यात्रा की शुरुआत हो गई ।

आज में भारत के गांव–शहरों में हर घर सोमवार के दिन विशेष पूजा होती है और खासकर के घर की महिला या कुंवारी कन्या दिनभर उपवास रहकर पूजा अर्चना करती है और शिव का अभिषेक करती है। इस दिन हर कोई कम से कम सुबह स्नान कर शिव की आराधना कर के ही भोजन ग्रहण करते है।
लोक आस्था का यह महापर्व को हरेक व्यक्ति बड़े धूमधाम से मनाता है और समाज का हर वर्ग इसमें सहयोग करता है।

उम्मीद करता हु आज का आर्टिकल जो प्रभु भोले के सावन प्रेम और भक्तों की आस्था से जुड़ाव के विषय में जानकारी आपको अच्छी लगी होगी । कोई सुझाव या प्रश्न हो तो टिप्पणी के माध्यम से हमसे जरूर पूछे। शाब्दिक त्रुटि हो तो क्षमा करे।

लेखन – गौतम राज़

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