चतुर्मुखी लिंग (Chaumukhi Mahadev Vaishali)

शिवलिंग तो आप ने सुना होगा, देखा होगा और पूजा तक की होंगी, बताया जाता है शिवलिंग, महादेव का ही एक अंश है, पर साथियों मैं अगर आप से कहु की हमने आपके लिए चतुर्मुखी लिंग का  दार्शनिक पल लाए है तो, हो गए न सन्न जी हा आज हम आपको बताएँगे ऐसे शिवलिंग, जिसे चतुर्मुखी लिंग कहा जाता है क्यू कहा जाता है इसे चतुर्लिंग? क्या सच है? कहा है यह दिव्य लिंग? वास्तविक है या धर्म के नाम पर कमाई? कितनी पुरानी है यह लिंग? किसने स्थापित किया यह लिंग?

तमाम सवाल के जवाब हम आपके लिए ढूंढ कर लाए है तो आर्टिकल को पूरा पढ़े और हमारी यूट्यूब चैनल Royal Yatra पर अपना स्नेह और कृपा बरसाए. वैशाली की गहराई जितनी इतिहास मे है उतनी ही यहाँ की धरती  भक्तिमय और देवतुल्य है साथियों आपकी रॉयल यात्रा वैशाली यात्रा के दौरान एक ऐसे दिव्य चतुरमुखी लिंग का दर्शन किया, जिसे देख कर हम धन्य हो गए है,

मंदिर देखने मे भले भव्य न हो किन्तु इसका इतिहास और महत्व बहुत ही भव्य है.

लिंग मन्दिर के जमीनी स्तर से तकरीबन 8-10 फुट निचे विराजमान है, गुप्तकालीन मे अधिकाधिक इस्तेमाल होने वाले काले पत्थर लिंग को 2500 साल पुराना बताती है. लिंग देखने मे अति विशाल प्रतीत होता है, बताया जाता है वैशाली के जिस स्थान पर यह लिंग विराजमान है, उसी जगह ग्रामीणों द्वारा कुँवा खोदा जा रहा था तक़रीबन 10-15 फिट की खुदाई मे ही यह लिंग मिल गई, मूर्ति के तेज, भव्यता और विशाल आकर देख सभी चौक गए और लिंग के मिलते ही गांव मे बारिश होने लगी और चारो तरफ हरियाली ने डेरा डाल दिया, यह चमत्कार देख ग्रामीणों ने वहा मन्दिर बनाने का निश्चय किया.

बात करे लिंग के स्वरुप की तो – पूरब की ओर भगवान विष्णु का स्वरुप है, पश्चिम की ओर भगवान ब्रह्मा का स्वरुप है, उत्तर मे सूर्य देव का स्वरुप है और दक्षिण मे देवो के देव महादेव विराजमान है. यह लिंग गुप्त काल की बताई जाती है और वैशाली गुप्त शासको की पसंदीदा स्थान मे से एक था, इसी का नतीजा है की यहाँ अशोक स्तम्भ, आंनद स्तूप जैसे ऐतिहासिक धरोहर भी है,

इतिहास से इस चतुरमुखी लिंग को जोड़कर देखे तो हमें पता चलता है की गुप्त काल मे काले पत्थर के प्रतिमा का प्रचलन ज्यादा है और वैशाली पुरातत्व के द्वारा खुदाई मे मिलने वाले सारे मूर्ति काले पत्थर के ही थे, जो वैशाली के संग्रहालय मे मिल जायेगा,

लिंग का महत्व –

गुप्त काल मे राजा ब्रह्मा के भक्त हुआ करते थे यही कारण है की एक मात्र प्रकृतिक लिंग के रुप मे यह एक मात्र ब्रह्मा का लिंग के रुप मे मूर्ति है और भारत मे यह दूसरे नंबर का जगह है जहाँ ब्रह्मा की पूजा होती है, एक पुष्कर (राजस्थान) वही ब्राह्मण, पुरोहित विष्णु को अपना परम् देवता मानते है इसलिए विष्णु की भी स्वरुप देखा जा सकता है, गुप्त काल सूर्य देव एक प्रमुख देवता हुआ करते थे और उनकी पूजा अर्चना भी बड़ी धूम-धाम से हुआ करती थी, यही कारण है लिंग मे सूर्य देव भी है,

वही दक्षिण की ओर महादेव का होना लिंग को दक्षिणेश्वर बनाकर एक सिद्ध लिंग की पहचान देती है, मन्दिर मे पूरब की ओर मुख्य दरवाजा है वही पश्चिम, उत्तर और दक्षिण मे भी उप दरवाजा है, यहाँ साल के हर दिन भक्तो की भीड़ लगी होती है, किन्तु श्रावण के महीने यहाँ हजारों भक्तो का आगमन होता है और भव्य मेला का आयोजन भी किया जाता है, आस-पास फूल, प्रसाद, माला आदि के दुकान मिल जायेंगे……

अगर आप वैशाली जाये तो इस दिव्य चतुरमुखी लिंग का दर्शन जरूर करे और मनोवांछित फ़ल प्राप्त करे.. पता – पटना से तक़रीबन 140 किलोमीटर उत्तर मे वैशाली जिला मे यह दिव्य चतुर्मुखी लिंग है..

(लेखन – गौतम राज़)

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