खजुराहो के मंदिरो का इतिहास ll History of Khajuraho Temples

चंदेल वंश के समय के समय खजुराहो में कुल पचासी (85 मंदिर थे किंतु अभी मात्र 22 मंदिर बचे हैं उन की भौगोलिक स्थिति के अनुसार उन्हें प्रमुख तीन समूह के रूप में बांटा गया है पश्चिमी समूह, पूर्वी समूह एवं दक्षिणी समूह। चलिए हम एक-एक करके समूहों में बने मंदिरों की जानकारी लेते हैं।

पश्चिमी समूह मंदिर (Western Temples)

खजुराहो गांव से पश्चिम की ओर होने के कारण इसे पश्चिमी समूह कहा जाता है। इस में कुल 12 मंदिर है और सबसे ज्यादा दार्शनिक एवम् सुंदर मंदिर इसी पश्चिमी समूह में है।

चौसठ योगिनी मंदिर (Chausath Yogini Temple)
चौसठ योगिनी मंदिर खजुराहो का सबसे प्राचीनतम मंदिर है। 6वीं शताब्दी के लगभग बना हुआ यह मंदिर चंदेल राजवंश के अस्तित्व में आने के लगभग 300 वर्ष पूर्व से यहां है। इस मंदिर की यहां उपस्थिति इस बात का परिचालक है कि चंदेल के अस्तित्व में आने से पहले यहां तंत्र दर्शन का बहुत प्रभाव था क्योंकि चौसठ योगिनीओ की पूजा  तांत्रिकों के द्वारा की जाती थी। मंदिर पूर्णत लावा पत्थर का बना हुआ है, कंदारिया महादेव मंदिर से करीब 3 फर्लांग दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर उत्तर मुखी है। लावा पत्थर के मध्य बना मंदिर 5.4 मीटर ऊंचा है। ऊपर की ओर से यह मंदिर खुला हुआ है तथा उसकी आकृति चौकोर है 31.4 मीटर ×18.3 मीटर चतुर कोनिय मंदिर है। शुरू में 67 छोटे-छोटे गर्भगृह के साथ बनाया गया था, जिनमें से 64 योगिनी तथा तीन अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थिति थी इनमें से केवल 35 ही बचे हुए हैं। इनमें भी किसी प्रकार की मूर्ति नहीं है। यह सभी पूर्ण खाली है अगर बहुत अधिक रुचि व समय ना हो तो इस मंदिर को कंदारिया महादेव मंदिर के चबूतरे से भी देखा जा सकता है किंतु फिर भी अगर आप वहां जाएंगे तो इतिहास के अनंत गहराई में छुपे भारतीय इतिहास और संस्कृति को आप देख सकेंगे। लक्ष्मण मंदिर के चारों ओर हुए जनजीवन के चरणों में से पूर्णिमा की रात्रि के सामूहिक संभोग के दृश्य के संदर्भ में भी किया जाता है।  कहते हैं कि मंत्रियों के द्वारा सामूहिक पूर्णिमा की हर रात को चौसठ योगिनी के मंदिरों में संपन्न होता था

ललंगुआ मंदिर
Lalangua Temple Khajuraho:-
चौसठ योगिनी मंदिर से 600 मीटर पश्चिम की ओर यह मंदिर  सागर के किनारे भगवान शिव के लिए बनाया गया था। यह एक साधारण आकार का पश्चिम मुखी मंदिर है जिसमें शिखर पिरामिड आकार का है। गर्भगृह पूर्णता खाली पड़ा है तथा मंदिर के सामने नंदी की एक सुंदर प्रतिमा 900 ईसवी के लगभग बने है। इस मंदिर की तुलना खजुराहो के ब्रह्मा मंदिर से की जा सकती है। इस समय तक बालू पत्थर की खोज हो चुकी थी, पर लावा पत्थर का फिर भी प्रयोग होता था या मंदिर खजुराहो के शुरुआती मंदिरों में गिना जाता है।

मतंगेश्वर मंदिर
Matangeshwar Temple Khajuraho:-
चंदेला राजाओं के द्वारा बनवाए गए मंदिरों में मतंगेश्वर ही पहला मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण हर्षवर्धन ने 920 ईस्वी के लगभग करवाया था खजुराहो के पुरातत्व मंदिरों में यही एकमात्र मंदिर है जिसमें अब भी पूजा पाठ होता है तथा लोकमत के अनुसार निर्माण काल से निरंतर होता आया है। यह खजुराहो के पवित्रतम मंदिर में से एक है मंदिर के बारे में मान्यता है कि सबसे पहले महाराजा हर्षवर्धन ने मरकत मणि नामक मनी की स्थापना की थी यहां। इस मनी को भगवान शिव ने खुद युधिष्ठिर को दिया था और युधिष्ठिर से ही चल कर यह मनी हर्षवर्धन तक पहुंचा था इस मनी की स्थापना के उपरांत ही वृहद तथा लिंग की स्थापना की गई थी। शिवलिंग का जंघा का  व्यास 7.2मीटर है एवं इसमें स्थित 2.5 मीटर तथा 1.1 मीटर व्यास का लिंग है जो अपने तरह का एक अलग ही शिवलिंग है। बालू पत्थर का बना हुआ मंदिर शिल्पकार की दृश्य से बहुत ही साधारण हैं रचना की दृष्टि से ब्रह्मा मंदिर का ही विशाल रूप है l उसी जगदी के ऊपर सामने सीढ़ियों से सुसज्जित गर्भगृह का द्वार है। गर्वगृह में गंगा एवं शिवलिंग की स्थापना है मंदिर की छत वर्गाकार सुंदर तथा विशाल है। मंदिर के तीन और अहाते दार झरोखे हैं जिनमें से उतरी झरोखे से होकर नीचे की ओर सीढ़ियां बनी है। मंदिर का एक ही शिकार सूचना कार्यालय में लिखी है। प्रवेश द्वार के ऊपर मुकुट से शिखर का सौंदर्य अद्वितीय हो जाता है। मंदिर के चबूतरे के दक्षिण में बना हुआ जॉर्डन संग्रहालय दिखलाई देता है जो कि अब पुरातत्व विभाग का अवशेष भंडार है।

वाराह मंदिर
Varah Temple Khajuraho:-
लावा पत्थर की काफी ऊंची नीव पर बना हुआ बालू पत्थर का यह मंदिर आयताकार मंडप के रूप में बना हुआ है। इसका शिखर मतंगेश्वर मंदिर की तरह सूची आकार का था। शिखर 14 स्तंभों पर खड़ा है इस मंदिर में भगवान विष्णु के वराह रूप को दिखाया गया है। वृहद एवं एक ही पत्थर से बनी हुई 2 पॉइंट 6 मीटर लंबी इस मूर्ति की विशेषता इसके ऊपर बनी छोटी अनगिनत देवी देवताओं की प्रतिमाएं हैं। वही वराह भगवान के उस रूप को दिखलाती है जब हिरण्याक्ष नामक राक्षस को मारकर पृथ्वी को पाताल से निकाल कर लाए थे। पृथ्वी की एक वृहद प्रतिमा भी यहां थी जो वराह के दक्षिण मुखी और पश्चिम की ओर अंकित शेष रहे हैं। केवल पैरों के द्वारा दृष्टिगत होती है या पृथ्वी की प्रतिमा की लगभग 2.4 मीटर ऊंची थी ऐसी प्रतीत होता है वाराह भगवान के इस रूप के नीचे शेषनाथ को भी भक्ति भाव में दिखलाया गया है तथा उसके सिर पर स्थित पृथ्वी को भी दिखाया गया है। मंदिर की छत सुंदर कमल के फूल की आकृति से सुसज्जित है। प्रमुख टुकड़ों में बने हुए कमल की विशेषता है कि यहां सहस्त्रदल पद्म का प्रतीक है। यह मंदिर मंगेश्वर मंदिर के पश्चात तथा लक्ष्मण मंदिर के पहले निर्मित हुआ है प्रतीत होता है लगभग 925 का निर्माण हुआ था।

लक्ष्मण मंदिर
Laxman Temple Khajuraho:-
लगभग 930 में बना हुआ भगवान विष्णु का यह मंदिर यशोवर्मन नामक राजा ने बनवाया था जिसका एक नाम लक्ष्मण वर्मन भी था इसलिए ही यह मंदिर लक्ष्मण मंदिर कहलाया। पंचायतन शैली से बना हुआ यह मंदिर खजुराहो में अब तक प्राप्त सभी मंदिरों में सबसे सुरक्षित स्थिति में स्थित है। लोकमत के अनुसार लक्ष्मण वर्मा ने मथुरा से 16000 शिल्पकारों को इस मंदिर के निर्माण के लिए बुलाया था तथा लगभग 7 वर्ष की अवधि में उन्होंने यह मंदिर बना कर तैयार किया था। मतंगेश्वर मंदिर से उत्तर की ओर स्थित यह मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर है तथा वैकुंड का प्रतीक है। गर्भगृह में स्थित भगवान विष्णु की प्रतिमा को भी उनके इसी विशेष रूप से दिखाई देती है यह मंदिर शानदार तथा पंचायतन शैली से बना है यही एकमात्र मंदिर है। जिस का चबूतरा भी अपनी प्रारंभिक स्थिति से सुरक्षित है। चबूतरे के ऊपर चारों ओर चार मंदिर है जो की प्रमुख देवताओं पारिवारिक देवताओं को परिभाषित करती हैं तथा मंदिर के ठीक सामने एक छोटा मंदिर है जो भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ का मंदिर रहा होगा। उसमें देवी ब्रह्माणी की प्रतिमा है तथा लक्ष्मी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इन्हीं पांच मंदिरों से सुसज्जित होने के कारण यह पंचायतन शैली का खजुराहो में बना हुआ पहला सुंदर मंदिर है। प्रमुख मंदिर के प्रवेश द्वार पर भगवान सूर्य की धूप में प्रतिमाह उन्हें हाथ में कमल के दो फूल लिए दिखलाया गया है। दक्षिण पूर्व कोने के मंदिर में गज लक्ष्मी की प्रतिमा है। प्रमुख मंदिर पर एक विहंगम दृष्टि डालने से ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि पूर्ण मंदिर चंदन की लकड़ी का बना कर तैयार किया गया है जबकि मंदिर बालूआ पत्थर का निर्माण किया गया है। मंदिर का निर्माण चित्रों के अनुसार छोटे-छोटे टुकड़ों में 30 किलोमीटर की दूरी पर नदी के किनारे पर स्थित बालू पत्थर की खदानों में हुआ। हर स्तर के लिए विशेष तरह की साज-सज्जा विचार का शिल्पकार ने छोटे-छोटे टुकड़ों में उन्हें गड़ा तथा उन पत्थरों पर संख्या अंकित कर उन्हें खजुराहो भेजा और यहां उन्हें उनकी संख्याओं के अनुसार नीचे से ऊपर की ओर जोड़कर पहले वेदी बंद फिर दीवार एवं उनके ऊपर शिखर के रूप में उन्हें प्रमुख मंदिर की बाएं और की परिक्रमा में हमें सर्वप्रथम विदेश्वर भगवान गणेश की प्रतिमा देखने को मिलती है। जब से विधि बंद तक हमें बेल बूटे एवं तृतीय तथा हाथियों की एक लाइन दिखाई देती है। उसके ऊपर छोटे-छोटे प्रतिमाओं की 2 लाइनें हैं। जिनमें नृत्य संगीत शिकार युद्ध मिथुन इत्यादि के दृश्य है। इस लाइन में उस युग की झांकियां दिखाई देती है जिसमें यह मंदिर निर्मित हुए उन्हें देखकर उस समय के रहन-सहन रीति-रिवाज व परंपराओं को जाना जा सकता है। छोटी-छोटी प्रतिमाओं की इन दो लाइनों से ऊपर प्रमुख दीवार आरंभ होती है। जिस पर प्रमुखता बड़ी प्रतिमात की 2 लाइनें बनी हुई है यह प्रतिमाएं 2.5 फीट ऊंची है
कतारों के मध्य की मूर्तियां प्रमुखता चतुर्मुखी है अर्थात देव प्रतिमाएं हैं ऊपर की कतार में विष्णु तथा नीचे की कतार में शिव की प्रतिमा है अपने विशेष चिन्ह तथा विष्णु शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं शिव त्रिशूल नागर रुद्राक्ष की माला व कमंडल के साथ प्रमुखता अभय तथा वर्ग मुद्राओं में दिखलाए गए हैं। इस चतुर्भुजी देव प्रतिमाओं के दोनों और संसार प्रसिद्ध सुर सुंदरियों देवदासी नागकन्या इत्यादि की विभिन्न भावों में प्रतिमाएं हैं।
इनमें से दक्षिण पूर्वी  की विष्णु के दाहिने और नायिका लायंस मुद्रा में उसी के नीचे शिव के दाहिने और की नायिका स्नान के बाद बालों को नीचे सवारती हुई तथा उसी के कोने में डिस्टर्ब भी ऊपर की ही कतार में प्रेम पत्र लिखते हुए नायिका का चित्रण विशेष उल्लेखनीय है। आगे बढ़कर हम  कार्तिकेय भगवान की मूर्ति को पार करते हुए मंदिर की मध्य दीवार को देखते हैं। इन प्रमुख दो कतारों के ऊपर मध्य में अग्नि देवता का चित्रण किया गया है। उनके नीचे मध्य में देवगन धर्मों को दिखलाया गया है तथा सबसे नीचे राग रानी तांत्रिक पुरोहित एवं योगिनी के साथ उत्तर दीवार पर इन्हीं लोगों के समूह को इस अनुष्ठान की दूसरी क्रिया संपन्न करते हुए दिखलाया गया है। नायिकाओं में ऊपर की कतार में जहां देव तथा गंधर्व को दिखलाया गया है उसके दाहिने और ही कालिदास की नायिका शकुंतला का चित्रण किया गया है जो कि अपने बालों को निचोड़ रही है एवं उसके पैर के पास है हंस के एक जोड़े जो कि इस धोखे में की शकुंतला के शरीर से पानी की बूंद नहीं वर्ण मोती टपक रहे हैं उन्हें चुगने को लगे आए हैं हंस या कल्पना कवि कालिदास ने अपने ग्रंथ अभिज्ञान शकुंतलम में की है शकुंतला इतनी सुंदर थी कि जब व स्नान कर सरोवर में से निकलती थी तो पानी की बूंदे उसके शरीर पर यू प्रतीत होता था जैसे मोती और हंस उसके पीछे दौड़े चले आते थे देव गंधर्व के बाएं और एक नायिका का चित्र है जो एक उत्तरीय शरीर पर धारण किए हैं तथा उसके अतिरिक्त पूर्ण नग्न है यानी कामुक्त मूर्तियां हैं हम कह सकते हैं कि इस मंदिर में बहुत सारी कामुक्त मूर्तियों को देखा जा सकता है।

विश्वनाथ मंदिर
Vishwanath temple Khajuraho:-
लक्ष्मण मंदिर के बाद बना हुआ यह मंदिर लगभग एक हजार दो इसवी में महाराजा गन्धदेववर्मन के द्वारा निर्मित किया गया था। यह मंदिर भी लक्ष्मण मंदिर से मिलता-जुलता ही है और यह मंदिर पंचायतन शैली में निर्मित किया गया है किंतु समय के कारण अब यह केवल दो उप मंदिर उत्तर पूर्व एवं दक्षिण पश्चिम कोने में स्थित है पूर्वी कोने के तीन पैनलों में पूर्णिमा की रात्रि के सामूहिक संभोग के दृश्य विशेष कर उल्लेखित है इनमें दूसरे पैनल के मध्य में तांत्रिकों द्वारा पंच मकर के निर्माण की क्रिया को दिखलाया गया है। किस प्रकार यह पंच मकार बनाया करते थे एवं इस पंच मकार को पीने के उपरांत विभिन्न मुद्राओं में सामूहिक मैथुन को संपन्न किया करते थे। आगे चलकर आखेट के दृश्य मिलते हैं फिर एक संगीत के अध्यापक को अपने शिष्य को नृत्य एवं संगीत की शिक्षा देते हुए दिखाया गया है यही घोड़े के साथ संभोग करते हुए सैनिक की सबसे विचित्र प्रतिमा भी है, क्योंकि युद्ध के मैदान में स्त्रीया नहीं होती थी इसलिए यदा-कदा सैनिक इन छोटे कद की घोड़ियों का प्रयोग करते थे और आगे चलने पर एक धर्म उपदेशक को अपने शिष्यों को धर्म उपदेश देते हुए दिखलाया गया है। इसके कुछ आगे चलकर विवाह का दृश्य है एवं फिर सैनिक सामंतों को आवागमन करते हुए दिखलाया गया है। जहां उन्हें जंगल से होकर जाते हुए दिखलाया गया है। वहां जंगल की स्थिति दिख लाने के लिए उनके पांव के पास जंगली जानवरों के जैसे सूअरों हिरणों आदि अनेक प्रकार के जानवरों का चित्रण किया गया है। दक्षिण पश्चिम की ओर इस लाइन में प्रमुखता सैनिक संबंधों का आवभगत एवं आखेट इत्यादि ही दिखलाया गया है। उत्तर की ओर प्रमुखता युद्ध इत्यादि के हि दृश्य ज्यादा है। उत्तरी पूर्वी कोने में 2 राजाओं को स्नान के पूर्व ललित आसन मुद्रा में बैठे हुए दिखलाया गया है। पूर्व की ओर लक्ष्मण भ्रमण को चयन करते हुए दिखाया गया है एवं अनंत इसी लाइन के उत्तर पूर्व के एक पैनल में शिल्पी को भी अधिक लाया गया है। जिनके हाथों में छैनी– हथौड़े है जिनसे इन्होंने यह अनूठे मंदिर बनाएं हैं।

किस कन्या की विभिन्नता की तरह तरह के आभूषणों से सुसज्जित यह मूर्तियां बड़ी ही भाव प्रवण है लक्ष्मण मंदिर से कहीं अधिक प्रकार के भावों को दिखलाती है। मंदिर के अंदर लगभग लक्ष्मण मंदिर के जैसा ही 5 भाग्य है प्रारंभिक भाग में मकर तोरण नहीं है जो कि निश्चित ही बना होता था पर समय के साथ टूट गया होगा या निकाल लिया गया होगा महा मंडप लगभग लक्ष्मण मंदिर के ही समान है गर्भ गृह में शिवलिंग है एवं प्रदक्षिणा पथ में अष्ट पालो की प्रतिमाएं हैं लक्ष्मण मंदिर के ही जैसा इस मंदिर में पांच प्रमुख अहाते वाले झरोखे की व्यवस्था है जिनमें से दो महा मंडप है से जुड़ी हुई है तथा तीन पीछे की ओर से एवं प्रदक्षिणा पथ से देखे जा सकते हैं पुरातत्व विभाग से इन हाथों को लोहे की जाली लगाकर बंद कर दिया है किंतु पुराने समय में इनका उपयोग पुजारियों एवं देवता स्त्रियों के द्वारा बैठने के लिए किया जाता था यहां बैठकर दृश्य लो कन्हैया धार्मिक चर्चाएं किया करते थे यहां बैठकर वाचक क्षमताओं को पुरान इत्यादि की कथाएं भी सुनाया करते थे ऐसी निर्धार मंदिर की बाहरी दीवारों पर दर्शाए गए इन झरोखे में दिखलाया गया है आंतरिक मंदिर के प्रमुख आलू में दक्षिण और अंधकासुर वध करते हुए शिव का चित्रण है पश्चिम की ओर नटराज एवं उत्तर की ओर अर्धनारीश्वर रूप में भगवान शिव को अंकित किया गया है लक्ष्मण मंदिर के ही जैसा यहां भी मंदिर के बाहर ही पल के मध्य भाग में मिथुन की प्रतिमाएं हैं जहां 2 से अधिक लोगों की उपस्थिति क्रिया के अनुष्ठान रूप में संपन्न होते हुए दिखलाए जाने के घटक है मंदिर की छोटी प्रतिमाओं वाली लाइने विशेष तौर से देखने योग्य है इनमें इस युग की विशेष चित्रण हुआ है जो अन्य मंदिर का अपेक्षा ज्यादा समृद्ध है।

पार्वती मंदिर
Parvathi Temple Khajuraho
विश्वनाथ मंदिर से दक्षिण पश्चिम की ओर स्थित यह मंदिर पूर्णता नया निर्मित किया गया है एवं ईट एवं चूने से बनाया गया है। 1880 के लगभग इसका पूर्ण निर्माण किया गया था। इस के प्रवेश द्वार पर उसी तरह तीन लोग अंकित है जैसे कि अन्य सभी मंदिरों में प्रवेश द्वारों पर अंकित है गर्भगृह में संभव स्थिति में बनी भगवती पार्वती की प्रतिमा है। मंदिर केवल एक ही शिखर से सुसज्जित है एवं गर्भगृह के रूप में वृहद चबूतरे पर निर्मित है

चित्रगुप्त मंदिर
Chitrakoot Temple Khajuraho:-
गंधदेव बर्मन के पुत्र द्वारा निर्मित यह मंदिर 11वीं शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्ध में बना था। खजुराहो मंदिर में बने मंदिरों में केवल यही एकमात्र मंदिर सूर्य का है।यह  चित्रगुप्त का मंदिर है इस मंदिर का नाम चित्रगुप्त नामक उप देवता के नाम पर पड़ा है जिनके बारे में हिंदू धारणा है कि यह मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा रखते हैं। गर्भ गृह में स्थित है  भगवान सूर्य की प्रतिमा के दाहिने और हाथ में लिखने लिए चित्रगुप्त की खंडित प्रतिमा है यह मंदिर निर्धार शैली से बना है अर्थात इस के आंतरिक तौर पर केवल 4 भाग ही है और मंडप मंडप अंतराल एवं नगरी इस मंदिर में परिक्रमा के लिए परिक्रमा पथ नहीं है वर्तमान स्थिति में मंदिर लगभग नया बना हुआ है। मंदिर का पहला हिस्सा 1920 में लगभग महाराजा छतरपुर के द्वारा बनाया गया था एवं बाहरी रूप से गर्भ गृह के ऊपर का शिखर एवं कई स्थानों पर प्रमुख दीवारों की तथा चुने के द्वारा जोड़कर फिर से बनाई गई है। इस मंदिर के प्रमुख छोटी प्रतिमाओं की एक लाइन तथा बड़ी प्रतिमाओं की 3 लाइनें हैं। इनमें से सबसे ऊपर की लाइन मैं प्रतिमाएं मध्यकाल की लगभग 1 फुट की ऊंची है l।गांव एवं अभिसारी गांव की प्रतिमाओं के अलावा विभिन्न आलिंगन के युग मंदिर की विशेषताएं हैं। मंदिर के प्रमुख दक्षिण की ओर के नीचे वाले आले में भगवान विष्णु के 11 सिर के साथ दिखलाया गया है जिनमें उनके अवतारों को प्रमुख रूप से दिखाया गया है। इसके ऊपर ब्रह्माणी की बहुत सुंदर प्रतिमा महाराजा लीला मुद्रा में बैठे हुए हैं।

देवी जगदंबा मंदिर
Devi Jagdamba temple Khajuraho:-
चित्रगुप्त मंदिर के सामान्य मंदिर एक निरंतर शैली में बना हुआ मंदिर है अर्थात आंतरिक रुप में इसके देखने से क्रमशः 4 भाग में प्रवेश द्वार, महामंडल, अंतराल तथा गर्भगृह ही देखने को मिलता है। बाहर में या मंदिर अन्य वृहद मंदिर से भिन्न चित्रगुप्त मंदिर के जैसा ही है। केवल 3 अक्षरों के साथ बना इस मंदिर का निर्माण भी गंड देववर्मन ने ही किया था। यह मंदिर विष्णु का मंदिर था उपरांत लगभग 1880 में महाराजा छतरपुर निहालगढ़ से पार्वती की मूर्ति लाकर यहां स्थापित किया। इसी कारण मंदिर पार्वती या देवी जगदंबा मंदिर के नाम से जाना जाने लगा।  मंडप के चबूतरे पर मंदिर बना है जो कि अभी नया ही बना हुआ है पुराने समय में दीवारों के अंदर हवन की व्यवस्था नहीं थी मंदिर के गर्भ गृह के द्वार के ऊपर में गरुड़ भगवान विष्णु के प्रतिमा इस बात का प्रमाण है कि मूल तो यह मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर था। गर्भगृह के अंदर जहां हमें पार्वती की प्रतिमा दिखाई देती है। वहीं मंदिर के पीछे की ओर देखने वाले स्थान दिखलाई देता है जहां भगवान विष्णु की मूल प्रतिमा स्थापित की गई होगी। बाहरी दीवारों पर अंकित कुछ आलिंगन मूर्तियां बहुत ही प्रसिद्ध है। चंद्रगुप्त मंदिर के जैसा ही इस मंदिर के बाहरी दीवारों पर प्रथम बड़ी प्रतिमाओं की दो लाइन है और छोटी प्रतिमाओं की एक लाइन बनी है। प्रमुख दीवार के प्रारंभ होने के पहले बेदी बंद के ऊपर जो छोटी-छोटी प्रतिमाएं के विभिन्न चैनलों वाली अन्य मंदिरों में दिखाई देती है। जिसमें जगजीवन के दृश्यों को दिखाया जाता है इस मंदिर में नहीं है।

पूर्वी मंदिर समूह

हनुमान की मूर्ति Hanuman Mandir Khajuraho:–

लगभग 3 मीटर ऊंची हनुमान की प्रतिमा पश्चिमी मंदिर समूह में गांव की ओर जाने पर रास्ते में बाई और पड़ता है मूर्ति को नए गर्भ गृह में स्थापित किया गया एवं श्रद्धालुओं ने सिंदूर से रंग दिया है प्रतिमा इसलिए भी उल्लेखनीय है कि इस पर एक शिलालेख है जो लगभग 922 ईसवी का प्रतीत होता है या खजुराहो में प्राप्त सभी शिलालेखों से पुराना है।ब्रह्मा मंदिर/ Brahma Mandir Khajuraho :–खजुराहो सागरिया निनोरा ताल के पूर्वी किनारे पर स्थित यह मंदिर 900 ईसवी के लगभग बनाया गया था एवं ललंगुआ महादेव मंदिर की तरह लावा पत्थर एवं बालू पत्थर दोनों के द्वारा निर्मित किया गया है। चबूतरा, दीवार लावा पत्थर की बनी हुई है एवं शिखर बालू पत्थर का है। पिरामिड शैली में मतंगेश्वर एवं ललंगुआ महादेव मंदिर की शैली को दोहराता है। मंदिर के अंदर तक चतुर्मुखी शिवलिंग है। शिवलिंग के चार मुख के कारण ही मंदिर का नाम ब्रह्मा मंदिर पड़ गया ह लगता है मंदिर के प्रवेश द्वार पर ब्रह्मा विष्णु एवं शिव की प्रतिमा है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर गंगा-यमुना की मूर्ति है किंतु जब इस मंदिर को देखेंगे तो इसमें मौजूद शिवलिंग के चारों को जब ध्यान से देखेंगे तो उसमें ब्रह्मा जी की कोई भी छवि नहीं दिखाई देगी आपको लगेगा कि या किसी अन्य देवता का मंदिर रहा होगा।

वामन मंदिरVaman Temple Khajuraho:–

ब्रह्मा मंदिर के लगभग 200 मीटर उत्तर पूर्व की ओर स्थित यह मंदिर निरंधार शैली का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। इस मंदिर का प्रवेश द्वार या अर्ध मंडप टूटा हुआ है। महामंडल एवं गर्भगृह अच्छीbस्थित मे है और अहाते वाले झरोखे से सुसज्जित यह मंदिर बाहरी रूप से प्रतिमाओं की दो कतारों से सुसज्जित है। इस मंदिर में मिथुन की प्रतिमाएं नहीं है। दो-चार ही आलिंगन की दृश्य आप यहां देख सकते हैं। अथवा सभी मूर्तियां लगभग अकेले एवं प्रमुखता नायिकाओं की बनी हुई है। पश्चिम की ओर के पाले में भगवान शिव के विवाह का सुंदर अंकन किया गया है। शिवम पार्वती की अग्नि के फेरे लेते हुए दिखलाया गया है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के वामन रूप में अद्भुत प्रतिमा है मंदिर के निर्मित किए जाने का समय 1050 से 1070 के लगभग माना जाता है।

खखरा मठ khakhra Math Khajuraho:–

यह विशेष वामन मंदिर के उत्तर पूर्व की ओर लगभग डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर स्थित है एक टूटे से चबूतरे एवं कुछ स्तंभों के अवशेष यहां मिलते हैं। यह मंदिर खजुराहो में स्थित एक बुद्धिस्ट मंदिर था। उसके गर्भ गृह में प्राप्त मूर्ति अब पुरातत्व संग्रहालय के प्रमुख कक्ष में देखने को मिलती है। बुद्ध की प्रतिमा भूमि स्पर्श ध्यान मुद्रा में है।

जवारी मंदिरJawari Temple Khajuraho:–

वामन मंदिर से लगभग 200 मीटर दक्षिण की ओर स्थित यह छोटा सा मंदिर भगवान विष्णु का मंदिर है। अपने छोटे रूप के होते हुए भी यहां मंदिर सुंदरता एवं कुछ विशेषताओं के लिए उल्लेखनीय है मंदिर के मंडप एवं गर्भगृह में यह दो प्रमुख भाग हैं प्रवेश द्वार पर लक्ष्मण मंदिर के जैसा ही मकर तोरण है जो कि काफी छोटा है गर्भगृह में भगवान विष्णु की ही प्रतिमा है। जिसका सिर खंडित है प्रतिमा भगवान विष्णु के वैकुंठ रूप में दिखाई गई है। मंदिर के बाहरी दीवारों को प्रतिमाओं के तीन कतारों से सुसज्जित किया गया है एवं छोटे मंदिर में इतनी प्रतिमाएं घनी बनी प्रतीक होती है। बहुत घनी यहां पर प्रतिमाएं 23 मैथुन यानी कामुक्त मूर्तियों के सुंदर दृश्य भी आपको यहां मिलते हैं। मंदिर की विशेषताओं में अष्ट दीपावली की प्रतिमाएं हैं जो कि अन्य मंदिरों से भी यहां आलो में दर्शाई गई है। इस मंदिर का छोटा रूप भी उल्लेखनीय वर्म विशेश्या मंदिर लगभग 275 से 11 ईसवी के मध्य में बना होगा और सबसे बड़ी बात यह है इस मंदिर में ही कामसूत्र फिल्म की शूटिंग के दौरान यहीं पर लगभग महीनों तक सेट यहीं पर बना रहा यानी कामसूत्र मूवी का काफी हिस्सा इसी भाग पर शुरू किया गया था या नहीं फिल्माया गया था।

घंटाई मंदिर Ghantai Temple Khajuraho:-

खजुराहो गांव से बाहर की ओर आने वाली दक्षिण रास्ते पर स्थित यह मंदिर अपने स्तंभों पर अंकित सुंदर घंटियों जो कि छतों से लटकी हुई है दिखाई देती है यही कारण है की इस घंटाई मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर खंडहर मात्र बच गया है। इसमें प्रवेश द्वार पर एवं महामंडल कुछ स्तंभों एवं छात्त के साथ रह गई है। मंदिर के रूप को एवं महा मंडप के प्रवेश द्वार पर अंकित शासन एवं अन्य मूर्तियों के द्वारा मंदिर के जैन मंदिर होने की पुष्टि होती है विद्वानों का मत है कि मंदिर अपने मौलिक रूप में पार्श्वनाथ मंदिर के समान रहा होगा। इस मंदिर की छत भी सुंदर दृश्यों से सुसज्जित है। महा मंडप के प्रवेश द्वार पर चक्रेश्वरी की प्रतिमा दिखाई गई है। वह मध्य में उन 16 स्वप्नों को दिखलाया गया है जो भगवान महावीर की मां को महावीर के गर्भ में आने से पूर्व दिखलाई गई थी।

पार्श्वनाथ मंदिर Parshvanath Temple Khajuraho:–

10 वीं शताब्दी में बना हुआ मंदिर जैन विश्वनाथ मंदिर के समकालीन बना था एवं शानदार मंदिर है। मूल तो यह मंदिर आदिनाथ के लिए बनाया गया था किंतु अब गर्भ गृह में पार्श्वनाथ की प्रतिमा स्थापित है। साहिल नामक सृष्टि ने इस मंदिर का निर्माण लगभग 950 ईस्वी में करवाया था।इसके महा मंडप के प्रवेश द्वार पर अंकित शिलालेख से ज्ञात होता है जैन मंदिर समूह में यह सबसे उल्लेखनीय मंदिर है। बाहर से दो प्रमुख एवं तीसरी छोटी की प्रतिमाओं की पंक्तियां से सुसज्जित मंदिर पंच शैली का मंदिर है। बाहरी दीवारों पर अष्टधातु की प्रतिमा बहुत ही सुंदर और आकर्षित करने वाली है एवं प्रतिमाओं को तीन लाइन में सबसे ऊपर गंधर्व को आकाश में उड़ते हुए दिखाया गया है। दक्षिण दीवार पर विष्णु लक्ष्मी की प्रतिमा इस मंदिर की दीवारों पर नायिकाओं की प्रतिमाओं में आंख में काजल लगाते हुए एवं दूसरे पांव पर महावर लगाते हुए प्रतीमा बहुत ही सुंदर है। इस मंदिर की इससे नीचे वाली लाइन में खजुराहो की सबसे बड़ी प्रतिमा लगभग साडे 3 फुट ऊंची दीवार पर पांव में घुंघरू बांध ने की एक बहुत सुंदर प्रतिमा है। उत्तर पश्चिम कोने में कामदेव रति की एक प्रतिमा भी उल्लेख है। कामदेव का चित्रण खजुराहो में यहीं पर हुआ है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर यहां जैन देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की बहुत गहरी गड़ी हुई थी। उल्लेखनीय है । कामदेव का चित्रण खजुराहो में यहीं पर हुआ है । मंदिर के प्रवेश द्वार पर जहां देव देवी देवताओं की प्रतिमा है वही मंडप की बहुत ही गहराई से कहा गया है प्रदक्षिणा पथ में छोटी-छोटी खिड़कियां से बनाई गई है जिनमें धुंधला सा प्रकाश अंदर आता है। आंतरिक मंदिर में भी अन्य मंदिरों के सदृश्य प्रतिमाओं की दो लाइन से अलंकृत हैं मंदिर के आंतरिक आलो में तीर्थंकरों की प्रतिमा बनी हुई है।

आदिनाथ मंदिरAdinath Temple Khajuraho:-

पार्श्वनाथ मंदिर के उत्तर की ओर बना हुआ यह मंदिर भी निराधार शैली का एक छोटा मंदिर है। प्रमुखता मंदिर का गर्भगृह तथा इसके ऊपर का शिखर ही मूल रूप से स्थित है। सामने का अंतराल अभी 19वीं शताब्दी में नया जोड़ा गया है। मंदिर के अंदर जैन तीर्थंकर आदिनाथ की प्रतिमा है तथा बाहरी दीवारों पर प्रतिमाओं के 3 पंक्तियां हैं इस मंदिर में युगल प्रतिमा नहीं है मंदिर के आलो में शासन देवियों की प्रतिमा दिखलाई गई है। सबसे ऊपर की कतार में उड़ती हुई गंधर्व की मूर्तियां तथा नीचे दोनों ओर तारों में नायिकाओं के विभिन्न मुद्राओं में प्रतिमाएं दिखाई गई है। शिखर का उल्लेख भी किया जा सकता है। नीचे से ऊपर तक एक ही शिखर है इसमें कोई भी उप शिखर नहीं है।

शांतिनाथ मंदिर Shantinath Temple Khajuraho:-

जैन मंदिर समूह में स्थित यह मंदिर भी एक उल्लेखनीय मंदिर है। इसके गर्भगृह में स्थित शांतिनाथ की प्रतिमा 4.5 मीटर ऊंची है एवं 11वीं शताब्दी में बनी हुई है। मूल मंदिर के चारों ओर यह मंदिर अभी 19वीं शताब्दी में बनाया गया है। इस मंदिर में जैन श्रद्धालु अब भी धार्मिक अनुष्ठान के लिए आते हैं एवं दैविक पूजा पाठ भी मंदिर में होता है।

दूल्हा देव मंदिरDulha dev Temple Khajuraho:-

घंटाई के मंदिर के दक्षिण में करीब ढाई सौ मीटर की दूरी पर स्थित भगवान शिव का यह मंदिर खजुराहो में चंदेल राज्य वंश द्वारा बनाए गए मंदिरों में सबसे नया है। 11वी से 1150 के मध्य में इसका निर्माण हुआ था जब इस मंदिर की खोज हुई तब यह बहुत ही खंडित अवस्था में था। प्रवेश द्वार महामंडल की अंतराल एवं गर्भगृह 4 भाग में बना हुआ है। एक निर्धार मंदिर है इस मंदिर का महा मंडप अन्य मंदिरों से भिन्न एवं एक वृहद आकार क्षेत्र के रूप में दृष्टि है। मंदिर के अंदर नृत्य के लिए बने हुए चबूतरा की व्यवस्था नहीं है। गर्भगृह के द्वार पर यहां तीन लोगों का चित्रण हुआ है अन्य मंदिरों की दृष्टि में यहां नृत्य लोक का चित्र गांव की विभिन्न मूर्तियों के द्वारा किया गया है गर्भ गृह में स्थित शिवलिंग सहस्त्र मुखी शिवलिंग है। अर्थात शिवलिंग में 1000 और छोटे-छोटे शिवलिंग अंकित किए गए मान्यताओं के अनुसार इस शिवलिंग की पूजा करने से 1001 शिवलिंग पूजा का प्राप्त होता है। फल मंदिर की बाहरी दीवारों पर औरों की तरह या प्रतिमा से सुसज्जित है। किंतु यह प्रतिमाएं अपनी शैली गति विशेषताओं के कारण मंदिरों की प्रतिमाओं से बिल्कुल भिन्न है। यह मंदिर की मूर्तियां जहां ऊंचाई में छोटी एवं गहराई में कम गहरी है। शरीर का भाव चित्रण में प्रतिमाओं से ज्यादा प्रमुख है दक्षिण में भगवान शिव के अंधकासुर वध करते हुए ऊपर वाले में पद्मासन में बैठे हुए दिखाई गई है। पश्चिमी आने में भगवान सूर्य की पद्मासन में लाया गया है। बाहरी दीवारों पर जहां नारी गांव तथा युगलों की विभिन्न मुद्राओं में दिखाई गई है वहीं कुछ मैथुन की मूर्तियां भी उल्लेखनीय है।

चतुर्भुज मंदिर Chaturbhuj Temple Khajuraho:-

खजुराहो गांव से करीब 3 किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर पक्की सड़क के द्वारा डायरो ड्रम रोड से जुड़ा हुआ है। निरंधार शैली से बना यह मंदिर आकृति डिस्ट्रिक्ट कौन से छोटा मंदिर है। गर्भ ग्रह एवं प्रवेश द्वार ही इस मंदिर से मिलते हैं। ललंगुआ महादेव मंदिर के अलावा यही एक मंदिर है जो पश्चिमी मुखी है। मंदिर का बाहरी दीवारों पर अंकित प्रतिमाएं बहुत ही उल्लेखनीय नहीं है, फिर भी उत्तर की ओर आने में नरसिंह ही प्रतिमा देवी लक्ष्मी नरसिंह के रूप में ललित आसन में बैठे हुए हैं। कुछ ऐसा ही दर्शाया गया है एवं दक्षिण की ओर के आने में अर्धनारीश्वर के रूप में भगवान शिव की प्रतिमा उल्लेखनीय है और प्रतिमाओं के ऊपर की लाइनों की गंधर्व एवं विद्याधर की प्रतिमाएं दर्शनीय है। युगलों को यहां नहीं दिखलाया गया है एवं नायकों की प्रतिमा में कोई उल्लेखनीय चित्र यहां नहीं हुआ है गर्भगृह में स्थित शिव के चार भुजाओं की प्रतिमा अभय मुद्रा में दक्षिण मुखी शिव को दर्शाता है 2.7 मीटर ऊंची एक ही पत्थर से बना हुआ प्रतिमा अप के भाव के लिए एवं शरीर त्रिभंगा स्थिति के लिए विशेष दर्शनीय है।

कंदारिया महादेव मंदिर
Kandariya Mahadev Mandir:-

1065 ईसवी के लगभग गंड देववर्मन के पुत्र विद्याधर द्वारा बनाया गया शिव का यह मंदिर मध्य युग स्थापत्य शिल्प कला का उत्कृष्ट मंदिर है। यहां तक तो स्थापत्य कला का विकास हुआ एवं इसके पश्चात उसका पतन होने लगा खजुराहो के मंदिर में सबसे अधिक विकसित स्थापत्य शैली मंदिर यही है। कहते हैं कि जब महाराजा विद्याधर दूसरी बार भी मोहम्मद गजनवी को परास्त कर भगाने में सफल हुए तब उन्होंने इसे भगवान शिव की कृपा माना एवं भगवान शिव का यह विशाल मंदिर निर्मित किया यह मंदिर 117 फुट ऊंचा एवं 117 फुट लंबा 66 फुट चौड़ा है मंदिर के सामने की ओर देखने से प्रतीत होता है कि जैसे कि किसी कंदरा गुफा का द्वार हो इसीलिए ही इस मंदिर का नाम कंदारिया महादेव अर्थात कंदरा में रहने वाले शिव पड़ा। इस मंदिर के गर्भ गृह में संगमरमर का बना हुआ शिवलिंग है जो कि कहते हैं कि अमरनाथ के शिवलिंग का प्रतीक है। सभी शानदार मंदिरों की तरह यह मंदिर में पांच भागों से मिलकर बना है।  बहुत बड़ा और विशाल है प्रवेश द्वार पर बना हुआ शुभम का प्रतीक मकर तोड़न एक ही पत्थर से बना हुआ  विशेष रूप से सुंदर ता का प्रतीक है। महामंडल के प्रवेश द्वार पर भी एक तोरण की व्यवस्था है जो कि बाहरी त्वरण से छोटा है महा मंडप है मंडप से प्रवेश कर दाहिने और के कोने के काले में भगवान शिव की सदा शिव रूप से प्रतिमा दृश्य में है। जिसमें उन्हें अपने आप के पहले शक्ति एवं फिर सभी अन्य देवताओं के रूप में पथ में भी सुंदर मूर्तियों देखने को मिलता है। बाहरी दीवार पर अन्य सभी मंदिरों की तरह ही सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश का चित्र मिलता है। आज के काल में शिव मंदिर होने के कारण चामुंडा इंद्राणी इत्यादि सप्त मातृका ओं का चित्रण है। बीच में लक्ष्मण मंदिर का दृश्य है लाजवाब है छोटी मूर्तियों के पैनल के 2 लाइनें बनी हुई है। जिनमें मंदिर के बनने से समय के जन जीवन का चित्रण दिखाया गया है। इनके ऊपर की मंदिर ऊंचा है यहां बड़ी प्रतिमाओं की 3 लाइनें देखने को मिलती है। इस मंदिर की प्रतिमाएं एवं सुंदर मूर्तियां मंदिरों की प्रतिमा ऊंची बड़ी है।  इस आसन का प्रयोग पुरुषों द्वारा स्तंभ की शक्ति विकसित करने के लिए किया जाता था उत्तर की ओर मध्य दीवार पर अंकित उनकी प्रतिमा भी अपनी भाव प्रवणता के लिए अद्वितीय है नीचे की ओर तीन प्रतिमाएं एक गरम में लाई गई है एवं कामसूत्र के दूसरे अध्याय में वर्णित है उस सिद्धांत को चित्रित करती है।

पूर्वी मंदिर समूह

हनुमान की मूर्ति
Hanuman Mandir Khajuraho:–
लगभग 3 मीटर ऊंची हनुमान की प्रतिमा पश्चिमी मंदिर समूह में गांव की ओर जाने पर रास्ते में बाई और पड़ता है मूर्ति को नए गर्भ गृह में स्थापित किया गया एवं श्रद्धालुओं ने सिंदूर से रंग दिया है प्रतिमा इसलिए भी उल्लेखनीय है कि इस पर एक शिलालेख है जो लगभग 922 ईसवी का प्रतीत होता है या खजुराहो में प्राप्त सभी शिलालेखों से पुराना है।

ब्रह्मा मंदिर/ Brahma Mandir Khajuraho :–
खजुराहो सागरिया निनोरा ताल के पूर्वी किनारे पर स्थित यह मंदिर 900 ईसवी के लगभग बनाया गया था एवं ललंगुआ महादेव मंदिर की तरह लावा पत्थर एवं बालू पत्थर दोनों के द्वारा निर्मित किया गया है। चबूतरा, दीवार लावा पत्थर की बनी हुई है एवं शिखर बालू पत्थर का है। पिरामिड शैली में मतंगेश्वर  एवं ललंगुआ महादेव मंदिर की शैली को दोहराता है। मंदिर के अंदर तक चतुर्मुखी शिवलिंग है। शिवलिंग के चार मुख के कारण ही मंदिर का नाम ब्रह्मा मंदिर पड़ गया ह लगता है मंदिर के प्रवेश द्वार पर ब्रह्मा विष्णु एवं शिव की प्रतिमा है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर गंगा-यमुना की मूर्ति है किंतु जब इस मंदिर को देखेंगे तो इसमें मौजूद शिवलिंग के चारों को जब ध्यान से देखेंगे तो उसमें ब्रह्मा जी की कोई भी छवि नहीं दिखाई देगी आपको लगेगा कि या किसी अन्य देवता का मंदिर रहा होगा।

वामन मंदिर
Vaman Temple Khajuraho:–
ब्रह्मा मंदिर के लगभग 200 मीटर उत्तर पूर्व की ओर स्थित यह मंदिर निरंधार शैली का एक महत्वपूर्ण मंदिर है। इस मंदिर का प्रवेश द्वार या अर्ध मंडप टूटा हुआ है। महामंडल एवं गर्भगृह अच्छीbस्थित मे है और अहाते वाले झरोखे से सुसज्जित यह मंदिर बाहरी रूप से प्रतिमाओं की दो कतारों से सुसज्जित है। इस मंदिर में मिथुन की प्रतिमाएं नहीं है। दो-चार ही आलिंगन की दृश्य आप यहां देख सकते हैं। अथवा सभी मूर्तियां लगभग अकेले एवं प्रमुखता नायिकाओं की बनी हुई है। पश्चिम की ओर के पाले में भगवान शिव के विवाह का सुंदर अंकन किया गया है। शिवम पार्वती की अग्नि के फेरे लेते हुए  दिखलाया गया है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के वामन रूप में अद्भुत प्रतिमा है मंदिर के निर्मित किए जाने का समय 1050 से 1070 के लगभग माना जाता है।

चतुर्भुज मंदिर
Chaturbhuj Temple Khajuraho:-
खजुराहो गांव से करीब 3 किलोमीटर दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर पक्की सड़क के द्वारा डायरो ड्रम रोड से जुड़ा हुआ है। निरंधार शैली से बना यह मंदिर आकृति डिस्ट्रिक्ट कौन से छोटा मंदिर है। गर्भ ग्रह एवं प्रवेश द्वार ही इस मंदिर से मिलते हैं। ललंगुआ महादेव मंदिर के अलावा यही एक मंदिर है जो पश्चिमी मुखी है। मंदिर का बाहरी दीवारों पर अंकित प्रतिमाएं बहुत ही उल्लेखनीय नहीं है, फिर भी उत्तर की ओर आने में नरसिंह ही प्रतिमा देवी लक्ष्मी नरसिंह के रूप में ललित आसन में बैठे हुए हैं। कुछ ऐसा ही दर्शाया गया है एवं दक्षिण की ओर के आने में अर्धनारीश्वर के रूप में भगवान शिव की प्रतिमा उल्लेखनीय है और प्रतिमाओं के ऊपर की लाइनों की गंधर्व एवं विद्याधर की प्रतिमाएं दर्शनीय है। युगलों को यहां नहीं दिखलाया गया है एवं नायकों की प्रतिमा में कोई उल्लेखनीय चित्र यहां नहीं हुआ है गर्भगृह में स्थित शिव के चार भुजाओं की प्रतिमा अभय मुद्रा में दक्षिण मुखी शिव को दर्शाता है 2.7 मीटर ऊंची एक ही पत्थर से बना हुआ प्रतिमा अप के भाव के लिए एवं शरीर त्रिभंगा स्थिति के लिए विशेष दर्शनीय है।

मेरा नाम पता है और मैं सोनपुर का रहने वाला हूं हमें लिखने हमें बहुत ही ज्यादा इंटरेस्ट है।

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