एक शहीद की अनसुनी कहानी (Maheshwar Singh Ek Shahid Ki Story)

किसी शहीद के लिए “गुमनाम” शब्द का प्रयोग करते हुए मुझे दुःख हो रहा है किन्तु कहते है की, सच को लिखना कड़वे नीम के पत्ते खाने जैसा होता है,
यु तो आजादी के संघर्ष मे माँ भारती के असंख्य पुत्रो ने निस्वार्थ रुप से अपने प्राणो की आहुति हसते-हसते दिए थे !
तब जाके कही हमें स्वतंत्रता की प्राप्ति हुई है !
किन्तु हम उन क्रन्तिकारी को  नहीं जानते, जिन्होंने इनके एक हुंकार मात्र से अपने शरीर का एक-एक बून्द माँ भारती के चरणों मे गिरा दिए!
तब कही जाकर हमें ये सौभाग्य मिला की तिरंगे के निचे खड़े होकर 52 सेकंड का राष्ट्रगान गा सके, जिन क्रांतिकारीयों का जिक्र हमने किया, इनके नाम के दिए हम प्रति वर्ष जलाते है और उन्हें सलाम भी करते है, इसमें कोई दो राय नहीं है की आज़ादी की लड़ाई मे इनका योगदान सर्वाधिक था, किन्तु किसी घर को बनाने मे रेत, सीमेंट, ईट, छर (सलीया) और रंग का उपयोग होता है किन्तु अगर हम कह दे की सिर्फ ईट या पत्थर से ही घर बन जायेगा तो ये तो तौहीन हो गई!
उसी प्रकार आज़ादी के शीर्ष नेतृत्व करने वाले क्रन्तिकारीयों के साथ उनका भी सम्मान और गुणगान होना चाहिए, जिन्होंने किसी भी आंदोलन को सफल बनाने के लिए अपने प्राणो को दाव पर लागा दिया था, इसी को उजागर करने हेतु Royal Yatra की टीम ऐसे लोगों को दुनिया के सामने उनकी कहानी लाने का बेडा अपने कंधो पर उठाया है !! आज हम वैसे ही एक महान क्रन्तिकारी के बारे मे बात करने वाले है!

shaheed maheshwar singh sonpur

Shaheed Maheshwar Singh Photo

महेश्वर सिंह, बिहार राज्य की राजधानी पटना से 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा गंडक और गंगा के पवित्र संगम पर एक खूबसूरत और पौराणिक स्थान सोनपुर मे 1919 मे जन्मे थे ! वे सोनपुर के एक प्रतिष्ठित परिवार से तालुक रखते थे ! सोनपुर मे लगने वाला “हरिहर क्षेत्र मेला” जो विश्व की सबसे बड़ी पशु मेला कहलाती है, और यह मेला कार्तिक पूर्णिमा से आरम्भ हो जाया करती थी और उस वक्त यह मेला 14 दिनों का लगता था ! चुकी मेला वैश्विक स्तर का था इसी कारण इस मेला मे गुप्त रुप से देश के कोने-कोने से बड़े-बड़े नेता और क्रांतिकारी जुटते थे और विगत वर्ष किए गए क्रन्तिकारी कार्यों की समीक्षा और अगले वर्ष की कार्य प्रणाली की रूपलेखा यही बनती थी !
महेश्वर जी का घर मेला मे था, तो यह बालावस्था से ही घर मे किसी को भनक लगे बिना ही इन सब कार्यक्रमों मे शामिल हो जाया करते थे, जिसका नतीजा यह हुआ की महेश्वर सिंह जी के जहेन मे खून की जगह राष्ट्रवाद का अंगार भरने लगा,
समय बीतता गया और महेश्वर सिंह जी की शादी महज 16-17 बरष की आयु मे कर दिया गया जो की महेश्वर जी के मन के विरूद्ध था, पर परिवार वालो के दबाव मे उन्हें मजबूरन यह शादी करनी पड़ी,
पर इनका ध्यान तो देशहित मे कुछ कर गुज़रने के लिए ललाईत था !
इतने समय बीतने के उपरांत भी महेश्वर जी के परिवार को कुछ भी पता न चला, उनके जिंदगी मे एक नया मोड़ आया ज़ब उनका दाखिला पटना के बी.एन कॉलेज मे हुआ, वहां उन्होंने कॉलेज के हर छात्र के दिल मे देशप्रेम और अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेकने की चिंगारी को जन्म दे दिया. बात 8 अगस्त 1942 की है ज़ब गाँधी जी ने कांग्रेस अधिवेशन मे “भारत छोडो” आंदोलन का प्रस्ताव रखा और नारा दिया “करो या मरो ” अधिवेशन मे प्रस्ताव को मजूरी मिली और यह आंदोलन आग से भी तेज़ पूर्ण देश मे फ़ैल गई !
9 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय मे क्रन्तिकारीयों ने सचिवालय पर ढाबा बोल दिया और सचिवालय के प्रांगण मे झंडा फहरा दिया, बढ़ते जन आक्रोश को काबू मे करने हेतु अंग्रेजो वहां फायरिंग कर दी जिसमे बिहार के सात क्रन्तिकारी अमर हो गए ! इस घटना से आघात हुए महेश्वर जी पटना से सीधे सोनपुर रवाना हो गए और परिवार को बिन बताये एक गुप्त रुप से आंदोलन की रुप रेखा तैयार कर दिए और उसकी तारीख मुक्करर हुई 15अगस्त 1942. घर वालो को इसकी भनक लग चुकी थी और घर वालो ने उन्हें एक कमरे मे बंद कर दिया ताकि वो बाहर जा न सके,
कहते है ममता के आगे कौन जीतता है, महेश्वर जी परिवार के एकलौते वारिश थे.. तारीख 15 अगस्त 1942 सोनपुर के मेला प्रांगण मे सैकड़ो की संख्या मे क्रन्तिकारी जुटे हुए थे चुकी महेश्वर जी कमरे मे कैद थे तो आंदोलन का जिम्मा शहीद तजमुल हुसैन और शहीद द्वारिका सिंह जी ने अपने कंधो पर ले ली,

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जब अंदोलन मे गये थे तब का फोटो

इंक़लाब के नारों से शुरुआत हुई आंदोलन और आगे बढ़ने लगी, महेश्वर जी से रहा न गया और उन्होंने दरवाजा तोड़, पीछे की रास्ते से दौड़ पड़े,  23 साल का नौजवान, घर का एकलौता चिराग, 3 छोटी बच्चिया को भूल सिंह की गर्जना भरते हुए दौड़ पड़े, अपने सबसे जोशीले क्रन्तिकारी को देख आंदोलनकारीयों का जज्बा सातवे आसमा को पार कर गई,
करवा सोनपुर कचहरी, थाना, बाज़ार को पार कर सोनपुर स्टेशन पर पहुंच गई… भीड़ मे लोग भी जुटते गए और एक विशाल लोगों की भीड़ का रुप ले चुकी थी, राष्ट्र प्रेम से ओत पोत क्रन्तिकारी ने रेल पटरियों को उखाड़ा शुरू कर दिया…
घबराई अंग्रेजी हुकूमत ने अपने फिरंगी सेना उतार दिए, लेकिन मर मिटने का जज्बा रखने वाले इन देश के परवानो को रोकना कोई आसान काम थोड़ी था ! आंदोलन को उग्र होते देख पहले हवा मे फायरिंग की गई जिस से क्रन्तिकारी और उग्र हो गऐ और इस बार निशाने पर फिरंगी सेना थी, भीड़ को आता देख अंग्रेजी कायरो ने क्रन्तिकारी पर गोली चला दी जो की पहली गोली महेश्वर जी के जंग पर लगी,
घायल सिंह की तरह दहाड़ते हुए महेश्वर जी बोले “कायर पैर पर क्या मारता है गोली मारनी है तो सीने पर मार, “
अगली गोली उनके सीने मे आ आलिंगन करने लगी, फिर भी वो अंग्रेजो की ओर बढ़ते गए और अंत मे एक गोली महेश्वर जी के सर मे जा घुसी और बेधड़क इंक़लाब जिंदाबाद के नारे के साथ जमीं पर गीर गए, इधर तजम्मुल हुसैन जी और द्वारका जी भी अंग्रेजी हुकूमत को पानी पीला दिए थे और अंततः उन्हें भी वीर गति प्राप्त हो गई,
खबर ज़ब सोनपुर के कोने-कोने मे पहुंची तो मातम का माहौल बन गया.. परिवार का चिराग न रहा और सोनपुर ने अपने होनहार बेटे को खो दिया… इसके बाद भी अंग्रेजो ने उनके परिवार का बड़ा उत्पीड़न किया और घर की हालत खराब हो गई, हालत इतनी बुरी हो गई की महेश्वर जी की छोटी पुत्री इलाज के अभाव मे रोग से मर गई, अब आप इसका निर्णय कीजिये क्या महेश्वर जी का त्याग याद करना और कृतिगान करने लायक नहीं है? आज उन्ही के याद मे महेश्वर चौक का निर्माण सोनपुर के तमाम लोग और महेश्वर जी के परिवार द्वारा कराया गया और साथ मे सोनपुर के प्लेटफार्म नम्बर 1 और 2 के बिच एक 4 फुट का स्मारक बनाकर शहीद को श्रद्धांजलि दी गई !
उनके परिवार ने सोनपुर के गाँधी आश्रम मे “शहीद महेश्वर स्मारक ” का निर्माण कराया और उस संग्रहालय मे अगस्त क्रांति की एक झलक को यादों मे समेत रखा गया है ! साथ मे एक बड़ी पुस्तकालय का निर्माण भी कराया गया, लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण भी देने का कार्य इसी संस्था के अंतगत होता है, कहते है की शहीद आज़ाद भारत नहीं देख सके किन्तु उनके अमर बलिदान का नतीजा ही है की आज हम आज़ाद भारत मे सांस ले रहे है !!
Royal Team शहीद महेश्वर जी, द्वारिका जी और शहीद तजम्मुल हुसैन के चरणों मे श्रद्धांजलि अर्पित करती है और लेख मे कुछ त्रुटि रही हो तो अबोध समझकर माफ करे,
 !!इंकलाब जिंदाबाद !!

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